रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ग्रुप कैप्टन वरुण सिंह के परिवार से की फोन पर बात – अभी क्रिटिकल है हालत, सलामती के लिए पूरा देश कर रहा प्रार्थना

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    एक ओर आज देश ने जनरल बिपिन रावत (General Bipin Rawat) को अंतिम विदाई दी तो दूसरी ओर शूरवीर ग्रुप कैप्टन वरुण सिंह (group captain varun singh) की सलामती के लिए पूरा देश दुआएं कर रहा है. वरुण सिंह हेलिकॉप्टर क्रैश के इकलौते सर्वाइवर हैं और अभी भी मौत से जंग लड़ रहे हैं. ग्रुप कैप्टन वरुण सिंह इस वक्त बेंगलुरु के कमांड हॉस्पिटल में भर्ती हैं. एयरफोर्स के मुताबिक उनकी हालत नाजुक है, लेकिन स्थिर बनी हुई है. उनके माता-पिता भी बेंगलुरु पहुंच चुके हैं.

    ICU के बाहर से जब उन्होंने अपने बेटे को देखा तो आंखें भर आईं, लेकिन फिर खुद को संभाला और बोले कि मेरा बेटा एक योद्धा है और इस लड़ाई में भी जीतकर लौटेगा. वायुवीर वरुण सिंह को लेकर ये विश्वास सिर्फ उनके माता-पिता को नहीं बल्कि उन्हें जानने वाले हर इंसान को है, क्योंकि अपने जज्बे और हिम्मत की बदौलत ग्रुप कैप्टन वरुण सिंह पहले भी मौत से दो-दो हाथ करके उसे मात दे चुके हैं.

    अभी भी मौत से जंग लड़ रहे हैं ग्रुप कैप्टन वरुण सिंह

    एक हेलिकॉप्टर क्रैश जिसने देश से कई योद्धाओं को छीन लिया. 13 लोगों की जान चली गई, लेकिन इसी धधकती आग के बीच ग्रुप कैप्टन वरुण सिंह जिंदा मिले, क्योंकि लपटों ने वरुण सिंह के शरीर को भले ही झुलसा दिया था, लेकिन उनके हौसले, कर्तव्य पथ पर कुछ भी कर गुजरने के बेमिसाल जज्बे और जिंदा रहने की जिद को जला नहीं पाईं. हम ऐसा क्यों कह रहे हैं, ये आप भी मानेंगे जब आप सोशल मीडिया पर ग्रुप कैप्टन वरुण सिंह का स्टेटस देखेंगे, क्योंकि जब हमने उसे देखा तो नतमस्तक हो गए.

    ये है वो स्टेटस, जिसमें लिखा है ईश्वर ने मुझे धरती पर कुछ निश्चित काम करने के लिए भेजा है, अभी मैं उन कामों को पूरा करने में इतना पीछे हूं कि मैं कभी मरूंगा नहीं. वायुवीर वरुण सिंह का ये प्रण, प्रमाण है उनके लिए राष्ट्र सर्वोपरि होने का, उनके कर्तव्यबोध का, उनकी जीवटता का उनके आशावान होने का. कभी भी निराश-हताश नहीं होने का. उनके आत्मबल और चट्टानी इरादों के चलते उनके परिवार और गांव को विश्वास है कि वरुण सिंह मौत को मात देकर जल्द घर लौटेंगे.

    सलामती की प्रार्थना कर रहे हर शख्स को यकीन है कि वरुण सिंह नामुमकिन को मुमकिन बना देंगे, जैसा वो अपने जज्बे से पहले भी कर चुके हैं. वो तारीख थी 12 अक्टूबर 2020. वरुण सिंह स्वदेशी लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट तेजस की उड़ान पर थे, तभी विमान में तकनीकी दिक्कत आ गई. उस वक्त वो एयरबेस से काफी दूर थे और ऊंचाई भी बहुत थी.10 हजार फीट की ऊंचाई पर अचानक फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम में गड़बड़ी आ गई और एयरक्राफ्ट का लाइफ सपोर्ट सिस्टम भी फेल होने लगा था.

    इसी साल 15 अगस्त को शौर्य चक्र से किया गया था सम्मानित

    प्लेन पर कंट्रोल रखना मुश्किल होने लगा था. प्लेन तेजी से नीचे की तरफ आ रहा था और वक्त लगातार कम हो रहा था. उनके पास केवल एक ही ऑप्शन था कि वो प्लेन से बाहर निकल जाएं और उसे क्रैश हो जाने दें, लेकिन उन्होंने प्लेन पर दोबारा कंट्रोल की कोशिश की. उनका ये फैसला उनकी जान पर भारी पड़ सकता था, लेकिन वो अपनी कोशिश में जुटे रहे और आखिरकार खराबी के बीच प्लेन को सही सलामत लैंड करने में कामयाब रहे. इस अदम्य साहस और पराक्रम के लिए वरुण सिंह को इसी साल 15 अगस्त को शांतिकाल में सेना के तीसरे सबसे प्रतिष्ठित अवॉर्ड शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया था.

    ग्रुप कैप्टन वरुण सिंह इस वक्त भी जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं. हम प्रार्थना करते हैं कि वो एक योद्धा की तरह जिंदगी की जंग जीतने में कामयाब रहे, लेकिन अब जबकि जनरल बिपिन रावत पंचतत्व में विलीन हो चुके हैं तो आपको पहाड़ के बेटे की पूरी कहानी सुनाते हैं. पहाड़ पर ही जन्मे बिपिन रावत ने पहाड़ पर युद्ध में महारत हासिल की और पहाड़ पर ही आखिरी सांस ली. जनरल बिपिन रावत पहाड़ का वो बेटा, जिन्होंने पहाड़ में ही आखिरी सांस ली. लेकिन इसके साथ ही उनके एक सपने का अंत हो गया, जिसे वो पहाड़ों के बीच ही देखते थे. जनरल रावत सेना से रिटायर होने के बाद अपने पैतृक गांव में बस जाना चाहते थे, लेकिन उनकी ये इच्छा पूरी नहीं हो सकी.

    उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल का ये वही गांव है सैंण. एक छोटा सा गांव जिसके चारों तरफ ऊंची-ऊंची पहाड़ियां हैं. जनरल रावत का जन्म इन्ही पहाड़ों के बीच सैंण गांव में हुआ. ऊंचाई वाले युद्ध क्षेत्र के योद्धा के तौर पर विख्यात जनरल रावत की जिंदगी शुरुआत इन्हीं पहाड़ों के बीच हुई. पहाड़ की टेढ़ी-मेढ़ी पगड़ंडियों पर पैदल चलते हुए उनका सफर आगे बढ़ता रहा. चाहे शुरुआती पढ़ाई देहरादून की रही हो या फिर शिमला की, पहाड़ों से उनका गहरा नाता जुड़ा रहा. गढ़वाल के एक छोटे से गांव से निकलकर रायसीना के सबसे ऊंचे सैन्य ओहदे तक पहुंचे जनरल रावत भारत की सेनाओं को सशक्त करने और देश रक्षा के कर्तव्यों को पूरी निष्ठा से निभाते-निभाते अपनी जिंदगी खपा दी.

    सेना में बतौर सेकंड लेफ्टिनेंट के तौर पर हुई थी जनरल बिपिन रावत की शुरुआत

    16 दिसंबर 1978 को जनरल बिपिन रावत की शुरुआत सेना में बतौर सेकंड लेफ्टिनेंट के तौर पर हुई थी. दो साल बाद 16 दिसंबर 1980 को लेफ्टिनेंट बने. फिर मेजर, लेफ्टिनेंट कर्नल, कर्नल, ब्रिगेडियर, मेजर जनरल और लेफ्टिनेंट जनरल बनते हुए वो 01 जनवरी 2017 से जनरल रावत कहे जाने लगे. जब देश में पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की नियुक्ति हुई तो 2019 से बिपिन रावत CDS जनरल बिपिन रावत भी कहलाए. 43 बरस के सैन्य सेवा में पहाड़ की तरह वो हर मोर्चे पर डरे रहे. हिंद की सेना का मान बढ़ाया. चीन से लेकर पाकिस्तान और म्यांमार तक हर तरफ दुश्मनों के लिए काल बनकर खड़े हुए जनरल रावत. डायनामिक मिलिट्री अफसर की पहचान वाले जनरल रावत चाहे LAC के दुर्गम पहाड़ रहे हों या LOC पर करगिल की चोटियां पोस्टेड रहे.

    जम्मू-कश्मीर से लेकर नॉर्थ ईस्ट के घने जंगलों और पहाड़ों तक में काम किया. पहाड़ों के बीच ही सर्जिकल स्ट्राइक कर पाकिस्तान को बेहिसाब दर्द दिया तो चीन को डोकलाम में उसकी हैसियत बताई. जनरल रावत जिन्हें पहाड़ा का बेटा कहा गया, हर काम में अव्वल रहे.