Wonder Woman 1984 Review : लम्बे इंतज़ार के बाद रिलीज हुई फिल्म-सुपरहीरो की ये फिल्म देखने के लिए खुद ‘सुपरहीरो’ बनना कतई जरूरी नहीं

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जैसा समय चल रहा है और जैसी खबरें कोरोना को लेकर रोज आती रहती हैं, वैसे में थिएटर जाकर सिनेमा देखना जान हथेली पर रखकर जाने से कम नहीं है। लेकिन, खुशी होती है देखकर कि सिनेमा का जुनून लोगों में इस डर के बाद भी सिर चढ़कर बोल रहा है। लोग मास्क, दस्ताने और सैनिटाइजर्स के साथ फिल्म देखने पहुंच रहे हैं। हां, फिल्में जो थिएटर तक पहुंचनी शुरू हुई है, उनके लिए जान हथेली पर रखने जैसा काम करना जरूरी है क्या? कम से कम वार्नर ब्रदर्स की फिल्म ‘वंडर वूमन 1984’ के लिए नहीं लगता। फिल्म अंग्रेजी के अलावा हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं में रिलीज हुई है। मेरा इस फिल्म को थिएटर में देखने का शुरू से मन रहा है लेकिन काश, ये फिल्म पहली ‘वंडर वूमन’ जैसी ही होती!

मार्वेल सिनेमैटिक यूनीवर्स जैसा ही वार्नर ब्रदर्स के सुपरहीरोज का भी अपना यूनीवर्स है। इस यूनीवर्स में वंडर वूमन पहली बार फिल्म ‘बैटमैन वर्सेज सुपरमैन: डॉन ऑफ जस्टिस‘ में दिखी फिर उनकी सोलो फिल्म आई और इसके बाद ‘जस्टिस लीग‘ में भी ये किरदार दिखता है। तब से तीन साल हो गए इस किरदार के प्रशंसकों को इंतजार करते हुए। ध्यान यहां ये रखना चाहिए कि ये किसी किरदार का रीबूट नहीं है। ये विश्वयुद्ध के बाद एक किरदार का सीधे 70 साल बाद की दुनिया से सामना है। 1984 की यादें ज्यादा पुरानी नहीं हैं, लेकिन फिल्म ‘वंडर वूमन 1984’ के लेखकों ने इस सामान्य बातों का भी ध्यान नहीं रखा।

फिल्म की रिलीज से पहले इसके निर्माताओं ने सोशल मीडिया पर इसका ओपनिंग सीक्वेंस रिलीज कर दिया। छोटी सी डायना एक बड़े से स्टेडियम में अपने कौशल के इम्तिहान के लिए तैयार होती दिखती है तो मन प्रसन्न होता है। उसकी चेष्टाओं, उसकी वेदनाओं से जुड़ने को जी चाहता है। लेकिन, बड़े परदे पर ये फिल्म ऐसा कुछ नहीं दिखाती कि पास की खाली सीट ही दर्शक भूल पाए। भूल पाए कि वह एक वैश्विक संकट के बीच अपनी मेहनत की कमाई खुद को ही खतरे में डालकर खर्च करने आया है। गैल गैडोट ने इजरायली फौज में काम किया है। मिस इजरायल भी वह रह चुकी हैं। लेकिन, ये सब अतीत की बातें हैं। अब वह 35 की हो चुकी हैं। उनका करिश्मा बचाए रखना उनकी खुद की और स्टूडियो दोनों की जिम्मेदारी है।

पिछली फिल्म में विमान हादसे में मारे गए वंडर वूमन के प्रेमी को कहानी में वापस लाना बढ़िया पैतरा है। लेकिन, इसका वैश्विक उद्देश्य क्या होगा? एक मानव विज्ञानी की आल्टर इमेज के साथ फिल्म की कहानी में उतरी वंडर वूमन के सामने के खलनायकों के किरदारों को गढ़ने में भी सावधानी नहीं बरती गई है। वहां थानोस पत्थरों में फंसा रहा, यहां मैक्स लॉर्ड वहीं अटका है। एमसीयू की कैप्टन मार्वेल के मुकाबले बॉक्स ऑफिस पर लाई गई वंडर वूमन की ये सीक्वेल अपनी पहली फिल्म के मुकाबले काफी कमजोर है। याद है पहली फिल्म का वो सीन, जब खंतियों से निकलकर वंडर वूमन नो मैन्स लैंड में आती है। उसके चेहरे पर दिखने वाला वो आभामंडल ही वंडरवूमन के किरदार का असली मंतव्य है, ऐसा कोई क्षण फिल्म ‘वंडर वूमन 1984’ में आखिर तक नहीं आता।