रियाजुल्ला खान का सियासी सवाल, पूछा – देश में सावरकर-जिन्ना युग आ गया?

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Riazullah Khan
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संघ प्रमुख मोहन भागवत ने इस सवाल के जवाब में कहा हां क्यों कहा और क्यों!कारण भाजपा और ओवैसी के अपरोक्ष गठबंधनओवैसी की लोकप्रियता बढ़ाने का श्रेय टीवी औऱ भाजपा को जाता है, जिनके माध्यम से मुसलमानो को बरगलाए जाने की कोशिश हो रही है असदुद्दीन क्या सोच रखते हैं और उनके मामलों पर पर क्या बात करते हैं।ओवैसी की पार्टी और आरएसएस दोनों को प्रतिबंधित किया गया था आज़ादी के वक़्त इसके लिए मजलिस का इतिहास जानने की ज़रूरत मजलिस’ का इतिहास।असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन जिसे मजलिस भी कहा जाता है, काफ़ी पुराना संगठन है. लगभग 85 साल पहले हैदराबाद में सामाजिक-धार्मिक संस्था के रूप में इसकी शुरुआत हुई थी.1928 में नवाब महमूद नवाज़ खान ने मजलिस स्थापना की थी और 1948 तक उनके पास इस संगठन की बागडोर रही. भारत की स्वतंत्रता के बाद यह संगठन हैदराबाद को स्वतंत्र देश के रूप में बनाए रखने की वकालत करता था.इसीलिए जब 1948 में हैदराबाद का भारत में विलय हुआ था, तब भारत सरकार ने इसे प्रतिबंधित कर दिया था. उस समय इसके अध्यक्ष रहे क़ासिम राजवी को गिरफ़्तार कर लिया गया था. बाद में राजवी पाकिस्तान चले गए मगर संगठन की ज़िम्मेदारी उस समय के मशहूर वकील अब्दुल वहाद ओवैसी को सौंप गए थे.तबसे, यानी पिछले पांच दशकों से अधिक समय से ओवैसी परिवार ही मजलिस को चला रहा है. 1957 में मजलिस को राजनीतिक पार्टी के तौर पर बहाल किया गया, इसके नाम में ‘ऑल इंडिया’ जोड़ा गया और इसका संविधान भी बदला गया.लेकिन सोच कट्टरपंथी ही रही 2014 के बाद जब भाजपा की सरकार आयी इस देश में तब एक बार फिर जिन्ना सावरकर थ्योरी को लागू करने के लिए ओवैसी और मोदी का अपरोक्ष गठबंधन हुआ और देश की तमाम अमन पसंद राजनैतिक पार्टियों को कमज़ोर करने के लिए नई धार्मिक राजनीति का उदय किया गया। साथ ही ओवैसी ने भाजपा को बिहार में वफादारी का गिफ्ट दिया लेकिन पश्चिम बंगाल में उनकी असलियत सामने आते ही उनका धार्मिक कट्टरता की राजनीति का दांव नही चला अब एक बार फिर देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में चुनाव में उतरकर अपने मालिक को मजबूत करने के लिए सेक्युलर वोट का बिखराव करने की तैयारी में लगे है ये वही ओवैसी जो पंजाब में चुनाव नही लड़ेंगे क्योंकि वहां मुस्लिम जनसंख्या कम है दलितों की या अम्बेडकर की फ़ोटो दिखा कर रिझाने वाले 35 प्रतिशत दलित वोट वाले राज्य में नही लड़ेंगे लेकिन उत्तर प्रदेश में भाजपा की राह सुगम बनाने के लिए अपने मालिक को वफादारी का सबूत देने को आतुर ये वही क्रोनोलोजी है जिन्ना और सावरकर वाली ।

इनकी चाल न ही पश्चिम बंगाल में कामयाब हुई न उत्तर प्रदेश में होगी बिहार से इनका चरित्र देश के सामने है । कुछ सवाल का खुद से जवाब मांगिये आज़म साहब ने विश्वविद्यालय बनवाया जेल में है ,जूनियर ओवैसी ने 30 मिनट पुलिस हटाने की बात की और निपटने की धमकी कोई कार्यवाही नही क्योंकि दोनों का लक्ष्य एक ओवैसी जितना मुस्लिम वोट का बिखराव करेगा विवादास्पद बयानबाज़ी करेगा उतना ही भाजपा को फायदा होगा । ओवैसी की पी आर एजेंसी असल में भाजपा ही है । उत्तरप्रदेश की जनता ने 2012 में एक बीजेपी ओरिजिन पार्टी पीस पार्टी को नकार के सपा की सरकार बनाई थी इस बार भी इन दोनों भाजपा और मजलिस को सबक सिखाएगी और एकजुट होकर किसानों को नवजवानों को महिलाओं को मुसीबत से निकलकर एक भरोसेमंद सरकार उत्तर प्रदेश को मिलेगी ऐसी कामना करते है।