देश की समृद्ध सांस्कृतिक-भाषाई धरोहर को बचाना जरूरी, भाषा भुलाई गई तो संस्कृति भी लुप्त हो जाएगी – उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू

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    VP Venkaiah Naidu
    VP Venkaiah Naidu

    उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू (M Venkaiah Naidu) ने रविवार को देश की समृद्ध सांस्कृतिक और भाषाई धरोहर को बचाने की जरूरत पर जोर दिया और लोगों से अनुरोध किया कि इस लिहाज से वैयक्तिक और सामूहिक स्तर पर प्रयास किए जाएं. उपराष्ट्रपति ने पिछले साल अक्टूबर में आयोजित सातवें विश्व तेलुगू साहित्य सम्मेलन पर आधारित एक पुस्तक का डिजिटल विमोचन किया.

    पुस्तक को जाने माने गायक एस. पी. बालासुब्रमण्यम को समर्पित करते हुए इसके संपादकों, लेखकों और प्रकाशकों को बधाई देते हुए नायडू ने देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने के लिए ऐसी अनेक पहलों का आह्वान किया.

    उपराष्ट्रपति सचिवालय द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार नायडू ने कहा कि इंटरनेट और डिजिटल प्रौद्योगिकियों के उभरने से लोगों को भाषाओं के संरक्षण और विकास के नए अवसर मिलते हैं. उन्होंने इन प्रौद्योगिकियों के प्रभावी इस्तेमाल की जरूरत बताई. उन्होंने कहा, ‘‘जिस दिन हमारी भाषा भुला दी जाएगी, हमारी संस्कृति भी लुप्त हो जाएगी. हमारे प्राचीन साहित्य को युवाओं के करीब लाया जाना चाहिए.’’

    हाल ही में वेंकैया नायडू ने पर्यावरण की रक्षा के लिए जनांदोलन का आह्वान किया और लोगों से विभिन्न संरक्षण गतिविधियों में स्वेच्छा से भाग लेने की अपील की थी. उन्होंने खासकर युवाओं से इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर अगुवाई करने और दूसरों को संपोषणीय पद्धतियां अपनाने के लिए प्रेरित करने का आह्वान किया. उन्होंने कहा था, ‘‘उन्हें लोगों के बीच यह विचार ले जाना चाहिए कि ‘यदि हम प्रकृति की देखभाल करेंगे, तो बदले में प्रकृति मानवजाति की देखभाल करेगी.’’

    विकास जरूरतों को पर्यावरण के साथ संतुलन करना होगा- नायडू

    तीव्र शहरीकरण और वनों की कटाई के प्रभावों का हवाला देते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में हाल में आकस्मिक बाढ़ एवं भूस्खलन जैसी प्रतिकूल मौसमी दशाएं बार-बार सामने आई हैं. नायडू ने कहा था, ‘‘ये इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि जलवायु परिवर्तन हकीकत है और चीजें यूं ही जारी नहीं रह सकती हैं.’’

    ऐसी मौसमी दशाओं को कम करने के लिए उन्होंने कहा, “…ऐसे में जरूरी है कि हम प्रकृति के साथ सौहार्दपूर्ण तरीके से रहें. हमें अपनी विकास जरूरतों को पर्यावरण सुरक्षा के साथ संतुलन कायम करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि हर व्यक्ति संपोषणीय जीवन शैली की अहमियत समझे. सार्थक विकास केवल तभी संभव है, जब उसमें पर्यावरण पर आने वाले खर्च को ध्यान में रखा जाए.”